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नवरात्रि पूजा और कलश स्थापना के शुभ मुहूर्त
September 28, 2019 • NEWS NETWORK VISHVA SATTA • धर्म

पावन पर्व  शारदीय नवरात्रि कल 29 सितंबर से शुरू हो रही है। कई लोग जहां नवरात्रि में अपने घर में कलश स्थापना करते हैं वहीं पूरे नौ दिन व्रत भी रखते हैं। माता के नौ रूपों की पूजा  नौ दिनों तक चलती हैं , मां दुर्गा के नौ रूप ये है 
शैलपुत्री,ब्रह्मचारिणी,चन्द्रघंटा,कूष्माण्डा,स्कंदमाता,कात्यायनी,कालरात्रि,महागौरी,सिद्धिदात्री
  । । या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: । ।
हमारी चेतना के अंदर सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण- तीनों प्रकार के गन व्याप्त हैं। प्रकृति के साथ इसी चेतना के उत्सव को नवरात्रि कहते है। इन ९ दिनों में पहले तीन दिन तमोगुणी प्रकृति की आराधना करते हैं, दूसरे तीन दिन रजोगुणी और आखरी तीन दिन सतोगुणी प्रकृति की आराधना का महत्व है ।दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती ये तीन रूप में माँ की आराधना करते हैवहीं कुछ भक्त  लोग ऐसे भी होते हैं जो घर में माता को विराजित करके, कलश स्थापना करके पूजा करते है जो विधि विधान से पूर्ण की जाती है 
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
मां दुर्गा की कृपा आशीर्वाद  पाने के लिए कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 16 मिनट से लेकर 7 बजकर 40 मिनट तक रहने वाला है।इसके अलावा जो भक्त सुबह कलश स्थापना न कर पा रहे हों उनके लिए दिन में 11 बजकर 48 मिनट से लेकर 12 बजकर 35 मिनट तक का समय कलश स्थापना के लिए शुभ रहने वाला है।नवरात्रि के पहले दिन जो घट स्थापना की जाती है उसे ही कलश स्थापना भी कहा जाता है। कलश स्थापना करने के लिए व्यक्ति को नदी की  साफ़ रेत का उपयोग करना चाहिए।इस रेत में जौ डालने के बाद कलश में गंगाजल, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, रोली, कलावा, चंदन, अक्षत, हल्दी, रुपया, पुष्पादि डालें।इसके बाद 'ॐ भूम्यै नमः' कहते हुए कलश को 7 अनाज के साथ रेत के ऊपर स्थापित कर दें। कलश की जगह पर नौ दिन तक अखंड दीप जलते रहने चाहिए।
कलश स्थापना विधि बिधान 
कलश स्थापना से पहले पूजा और स्थापना स्थल को गंगाजल से पवित्र कर लें।व्रत करने का संकल्प लेने के बाद, मिट्टी की वेदी बनाकर जौ बोया जाता है। दरअसल हिंदुओं में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है।चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर देवी जी और गणेश जी और नवग्रह स्थापित करें। उसके साथ जमीन पर जहां जौ बोया है, वहां कलश स्थापित करें।कलश पर मौली बांध दें और उस पर स्वास्तिक बना दें। कलश में 1 रुपए का सिक्का हल्दी की गांठ और दूर्वा डाल दें और पांच प्रकार के पत्तों से सजाएं। कलश को सिकोरे से ढक दें और उसको चावल से भर दें। इसके बाद उस पर नारियल स्थापित करें। कलश को भगवान विष्णु जी का ही रूप माना जाता है।पूजन में समस्त देवी-देवताओं का आह्वान करें। मिट्टी की वेदी पर सतनज और जौ बोये जाते हैं, जिन्हें दशमी तिथि को पारण के समय बिसर्जित किया जाता है।नौ दिन 'दुर्गा सप्तशती' का पाठ किया जाता है। पाठ पूजन के समय अखंड जोत जलती रहनी चाहिए।
 कलश स्थापना के खास नियम 
कलश की स्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करें।कभी भी कलश का मुंह खुला न रखें। अगर आप कलश को किसी ढक्कन से ढक रहे हैं, तो उस ढक्कन को भी चावलों से भर दें। इसके बाद उसके बीचों-बीच एक नारियल भी रखें।
पूजा करने के बाद मां को दोनों समय लौंग और बताशे का भोग लगाएं। मां को लाल फूल बेहद प्रिय है। लेकिन भूलकर भी माता रानी को आक, मदार, दूब और तुलसी ना चढ़ाएं।