ALL राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय खेल मध्यप्रदेश राज्य धर्म विचार-विमर्श टेक्नोलॉजी
कितना स्वतंत्र है हमारा प्रेस ?
November 16, 2019 • विनोद पांडेय • राष्ट्रीय

नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट (इंडिया) के साथ विजन फाउंडेशन द्वारा किये गए सर्वेक्षण में खुलासा- 5 में 3 पत्रकारों को करना पड़ता है धमकियों का सामना

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है ऒर पत्रकार समाज का दर्पण होते हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में भी सच्चाई को सामने लाते हैं. आज राष्ट्रीय प्रेस दिवस है,देश में हर साल 16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस  मनाया जाता है. यह दिन प्रेस की आजादी और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारियों का प्रतीक है. इस दिन ही भारतीय प्रेस परिषद  ने कार्य करना शुरू किया था.विश्व में आज लगभग 50 देशों में प्रेस परिषद या मीडिया परिषद है। यह दिन  पत्रकारों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से स्वयं को फिर से समर्पित करने का अवसर भी प्रदान करता है।लेकिन आज हम कितने स्वत्रन्त्र है ऒर किस दिशा में जा रहे है यह सोचने का विषय है नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट (इंडिया) के साथ विजन फाउंडेशन द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि कुल उत्तरदाताओं में से 29 फीसदी ने कहा कि उन्हें साल में एक बार धमकी मिली, जबकि 19 फीसदी पत्रकार उत्तरदाताओं  ने कहा कि उन्हें महीने में कई बार धमकियां मिलीं।भारत में पांच में से तीन पत्रकारों को कभी न कभी धमकी या दबाव का सामना करना पड़ता है। ये धमकियां ज्यादातर सोशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे फेसबुक, ट्विटर के साथ-साथ निजी संदेश ऐप जैसे व्हाट्स ऐप के जरिए दी जाती हैं। या फिर प्रशानिक होती ही यह जानकारी शुक्रवार को एक सर्वेक्षण में दी गई।धमकी/उत्पीड़न का सामना करने वालों में से 35 फीसदी का मानना है कि उन्हें उनकी द्वारा की गई खबर के रिपोर्ट करने के तरीके या दृष्टिकोण की वजह से निशाना बनाया गया।नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट ,इंडिया के साथ विजन फाउंडेशन द्वारा किए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि कुल उत्तरदाताओं में से 29 फीसदी ने कहा कि उन्हें साल में एक बार धमकी मिली, जबकि 19 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें महीने में कई बार धमकियां मिलीं।धमकी पाने वालों में करीब 46 फीसदी ने दावा किया कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे ट्विटर या फेसबुक इसके माध्यम रहे। इसके साथ ही 17 फीसदी उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें निजी संदेश ऐप जैसे व्हाट्स ऐप से धमकियां दी गईं।दूसरी तरफ 76 फीसदी पत्रकारों ने कहा कि उनके संस्थानों में कोई सुरक्षा प्रोटोकॉल मौजूद नहीं है और उन्हें सुरक्षा मुद्दों को लेकर प्रशिक्षित भी नहीं किया जाता। साल 2019 में काम संबंधी मुद्दों के कारण चार पत्रकारों की हत्या की जा चुकी है।