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बिहार के चुनाव ‘‘परिणाम’’ कहीं ‘‘अंकगणित‘‘ को गलत तो सिद्ध नहीं कर देंगे?
November 4, 2020 • विनोद पान्डेय • विचार-विमर्श


चुनाव परिणाम जो भी आए, लेकिन निश्चित रूप से तेजस्वी इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि विधानसभा के इस आम चुनाव में ‘‘रोजगार के मुद्दे‘‘ को रोजी-रोटी के साथ जोड़कर मुख्य चुनावी एजेंडा व ‘‘नरेटिव‘‘ के रूप में केंद्रित करने में वे सफल होते दिख रहे है। उन्होंने एक नया नारा दे दिया है कि, इस चुनावी त्यौहार में जनता कमाई, पढ़ाई, सिंचाई, महंगाई, दवाई सुनवाई, व कार्यवाही करने वाली सरकार चुने।
राजीव खण्डेलवाल:-
बिहार के चुनाव परिणाम प्रायः अप्रत्याशित ही रहे हैं। याद कीजिये! पिछले विधानसभा के आम चुनाव के परिणाम। पहले घंटे के निकले हुए परिणाम धीरे-धीरे और अंततः एकदम से विपरीत हो गये थे। जिस कारण चुनाव परिणाम की विवेचना करने स्टुडियोज में बैठे समस्त ज्ञानी, बुद्धिजीवी, व मूर्धन्य पत्रकार व विशेषज्ञ लोगों को शर्मिंदा तक होना पड़ा था। यह चुनाव भी अप्रत्याशित परिणाम लाये तो आश्चर्य नहीं होना आज की चाहिये। वैसे बिहार ‘‘अप्रत्याशितता’’ व "विरोधाभास" की कर्मभूमि रही है। ‘‘जेपी आंदोलन’’ से लेकर उससे उत्पन्न नेता या तो जेल में है या "सुशासन बाबू"से होकर अब वे शायद शासन करने लायक भी नहीं रह जायेगें। एक ‘‘मोदी’’ के रहते दूसरे "मोदी" की जरूरत नहीं कहने वाला प्रदेश आज ‘‘मोदी मोदी’’ हो रहा है। ‘‘मोदी’’ के सम्मान में आयोजित भोज को निरस्त करने वाले आज "मंच साझा" करने के लिये तड़प रहे है। चुनावी सभाओं में  अनुच्छेद 370 हटाने को अपनी उपलब्धियां बताने वाले प्रधानमंत्री उसका विरोध करने वाले मुख्यमंत्री के लिए वोट मांग रहे हैं। ये "विरोधाभास" बिहार की खासियत है।‘‘राजद‘‘ के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद के दावेदार लालू यादव के सुपुत्र, पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने ‘‘महागठबंधन’’ का ‘‘बदलाव का संकल्प पत्र’’ जारी करते हुए यह घोषणा की कि वे प्रथम कैबिनेट में ही पहले हस्ताक्षर से 10 लाख ‘‘बेरोजगार नौजवानों‘‘ को ‘‘सरकारी नौकरी‘‘ देंगे। उक्त घोषणा ने न केवल राजनीतिक क्षेत्रों में तहलका मचा दिया बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों को थोड़ा अचंभित भी कर दिया। सिर्फ "नौंवी पास" व्यक्ति का इतना बड़ा आर्थिक दाँव/पासा फेकना? बिना देर किये मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने तेजस्वी के 10 लाख लोगों को नौकरी देनी की घोषणा पर कटाक्ष करते हुए कहा कि इसके लिए 58 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा धन की व्यवस्था करनी पड़ेगी, जो कि वर्तमान में सरकार के कुल वार्षिक बजट लगभग 2 लाख करोड़ को देखते हुए, समस्त अन्य खर्चों व विकास खर्चों की मदों के मद्देनजर बिल्कुल भी सम्भव नहीं है। ‘तंज‘ कसते हुए यह कहा कि क्या यह व्यवस्था "नकली नोटों को छापकर" या उन पैसो से जिसने ‘जेल’ पहुंचाया हो, से होगी? इस प्रकार उन्होंने तेजस्वी की उक्त उद्घोषणा को ‘‘ढ़पोरशंखी घोषणा‘‘ और चुनावी जुमला तक बता दिया।2014 के लोकसभा चुनाव में विदेशों से कालाधन वापिस लाकर प्रत्येक नागरिक के बैंक खाते में 15-15 लाख जमा करने (जिसे बाद में स्वयं अमित शाह ने ‘जुमला’ करार कर दिया था) तथा दो करोड़ हर साल रोजगार सृजन करने का वादा करने वाली ‘‘पार्टी‘‘ से उक्त वादे की पूर्ति पर जब ‘प्रश्न’ पूछा जाता है, तब वह उक्त वादों पर अपनी उपलब्धियां गिनाने (प्रभावशाली आंकड़ों के अभाव में) के बजाय विपक्षी पार्टियों का ‘इतिहास‘ बताने या 15 वर्ष पूर्व का इतिहास पूछने में लग जाती है। तब ऐसी पार्टी के द्वारा बिहार चुनाव के संदर्भ में  तेजस्वी के 10 लाख नौकरी देने के वायदे को जुमला कहना कितना नैतिक व तथ्यात्मक रूप से सही होगा, इसका मंथन आप स्वयं कर सकते हैं।यहां तक तो ठीक था। परन्तु तेजस्वी की ‘‘नौकरी’’ देने की उक्त घोषणा का बेरोजगार नवयुवक मतदाताओं पर तेजी से पड़ते हुए प्रभाव के भय से चिंतित होकर आनन-फानन में उक्त दावे की आलोचना करने के अगले ही दिन ‘‘महागठबंधन‘‘ के विरोधी गठबंधन ‘‘एनडीए‘‘ की ‘‘डबल इंजन की सरकार‘‘ (जिसे अभी अभी लालू ने ‘‘ट्रबल इंजन‘‘ की सरकार कहां है) के एक प्रमुख घटक भारतीय जनता पार्टी ने पांच सूत्र एक लक्ष्य व ग्यारह संकल्पों के साथ ‘‘संकल्प विजन डाॅक्यूमेंट‘‘ जारी किया, जिसमें ‘‘अटका बनिया देय उधार‘‘ की तर्ज पर 19 लाख लोगों को ‘‘रोजगार‘‘ देने का वादा किया गया। जब पत्रकारों ने यह पूछा कि 10 लाख नौकरी की घोषणा पर अमल होना संभव ही नहीं है, कहकर आप तो तेजस्वी की आलोचना कर मजाक उड़ा रहे थे, फिर अब 19 लाख की बात कैसे? इस पर उन्होंने यह स्पष्टीकरण दिया कि हम ‘‘नौकरी‘‘ की नहीं ‘‘रोजगार‘‘ देने की बात कर रहे हैं। यहीं पर एनडीए तेजस्वी की फेंकी हुई ‘‘गुगली’’ में फंस गई। नौकरी का नहीं "सरकारी नौकरी" का महत्व है। सरकार पर काबिज व "सरकार" का महत्व समझने वाले ‘‘सरकारी’’ नौकरी का महत्व नहीं समझ पाये और यही पर तेजस्वी भारी पड़ गये। एनडीए महागठबंधन की पहली कैबिनेट में नौकरी  देने की घोषणा की तकनीकि त्रुटियां, कमियां व अड़चन बतलाने के अलावा स्वयं इस बात का स्पष्टीकरण नहीं दे पाया कि इन 19 लाख रोजगार में नौकरी की कितनी संख्या शामिल है? और ये 19 लाख रोजगार वे कितने दिनों में देंगे? इस कारण उन्हें अगर-मगर करते हुए अगल-बगल झांकना पड़ रहा है।तेजस्वी 10 लाख नौकरी किस प्रकार देंगे, उसका ब्योरा भी वे जनता के बीच लगातार प्रस्तुत कर रहे हैं। जो कम पढ़े लिखे नेता की कम पढ़ी लिखी जनता को ‘भा‘ भी रहा है।  19 लाख जो कि ज्यादा बड़ा आंकड़ा है, की तुलना में 10 लाख (लगभग आधा) पर मतदाता ज्यादा विश्वास कर रहे हैं, जो अंक गणित की अति सामान्य धारणा के विपरीत है। इसीलिए लेख का उक्त ‘शीर्षक‘ दिया गया है। इसी कारण पहले तेजस्वी के दावे का मखौल उड़ाना, ‘बोगस’ करार देना फिर उसकी काट के लिये 19 लाख रोजगार की बात करना, परन्तु उसमें नौकरी के आंकड़े न देना व समय सीमा निर्धारित न करने के कारण परिर्वतन की चाह के चलते जनता तेजस्वी पर ज्यादा विश्वास करने के लिये मजबूर सी हो गई लगती है। संभवतः बिहार के चुनावों में शायद यही होने भी वाला है।बिहार विधानसभा के महत्वपूर्ण हो रहे आम चुनाव के ‘‘आंकड़ों’’ के ‘‘रण’’ में ‘‘तेजस्वी‘‘ के पीछे देश के समस्त ‘‘यशस्वी‘‘ लोग लग गये हैं। जिस कारण से दिनों दिन बढ़ते विश्वास के साथ तेजस्वी एक युवा चेहरे के रूप में उभर रहे हैं। लालू यादव के ‘‘दाग‘‘ व ‘‘कांड’’ फिलहाल कहीं भी उनका पीछा करते हुए नहीं दिख रहे हैं। शायद इस कारण से तेजस्वी ‘यशस्वी‘ बनने की ओर आगे बढ़ रहे हैं, और एनडीए की ‘‘ईंट से ईंट‘‘ बजाने के लिये कृत-संकल्प दिखायी पड़ रहे हैं। परंतु तेजस्वी के पीछे पड़े उक्त ‘‘यशस्वीगण’’ ‘‘आकाश पाताल एक कर के‘‘ भी तेजस्वी के ‘‘तेज‘‘ को पीछे छोड़ पायेंगे? यह देखने की बात होगी। ‘‘लालू राबड़ी की चुनाव प्रचार में ‘‘फोटो‘‘ न लगाने पर तेजस्वी की आलोचना करना "राजनैतिक समझ" से परे है। अपने को अधिक समझदार मानने वाले राजनीतिक गण कृपया यह बताने का कष्ट करेंगे कि आपकी आलोचना से ड़र कर या जवाब में यदि तेजस्वी अपने माता-पिता की फोटो तीसरे दौर के चुनाव प्रचार में लगा दें तो क्या आप फूलों मालाओं की हार के साथ उनकी "समालोचक प्रशंसा" करेंगे? "दागी" होने के कारण माता-पिता होने के बावजूद तेजस्विनी  उनकी फोटों नहीं लगाई तो, राजनीति में "स्वच्छता" बढ़ाने के लिये तेजस्वी की पीठ थपथपाई जानी चाहिये थी। एनडीए के लिये तो तेजस्वी का यह कदम ‘‘आत्मघाती’’ गोल सिद्ध हो सकता था। यदि एनडीए .‘दागी’ स्थिति को अप्रत्यक्षतः स्वीकार किये जाने के कारण फोटो न लगाने के लिये तेजस्वी की आलोचना करने के बजाए उन्हे साहस पूर्वक आगे आकर बधाई दे देते! देश की "राजनीति" ऐसी "राजनीति" से कब ऊपर उठकर जनहित नीति व स्वस्थ्य व स्वच्छ "राजनीति" में परिणित होगी, देश इसकी प्रतीक्षा कर रहा है।वर्तमान चुनाव में चिराग पासवान ‘‘अपनी खिचड़ी आप‘‘ पका रहे हैं। उनका नारा ‘‘नीतीश कुंआ तो तेजस्वी खाई’’ को चिराग के एक ‘‘शुभचिंतक‘‘ ने आगे बढ़ाया ‘तेजस्वी खाई तो चिराग पलटाई।‘ ’’पलटवार‘‘ व ‘‘वोट कटुवा‘‘ (भाजपा की निगाहों में) ‘‘कुआं एवं खाई‘‘ में से किसका ‘‘चिराग‘‘ जलाकर ‘‘उजाला‘‘ पैदा करेंगें, ‘‘अंकगणित‘‘ को सही या गलत सिद्ध करेंगे, यह तो 10 नवंबर को ही पता चल पाएगा। तब तक कुछ अन्य और ‘‘शब्द बाणों’’ का आनन्द लीजिये!चुनाव परिणाम जो भी आए, लेकिन निश्चित रूप से तेजस्वी इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि इस आम चुनाव में ‘‘रोजगार के मुद्दे‘‘ को रोजी-रोटी के साथ जोड़कर मुख्य चुनावी एजेंडा व ‘‘नरेटिव‘‘ के रूप में केंद्रित करने में वे सफल होते दिख रहे है। उन्होंने एक नया नारा दे दिया है कि, इस चुनावी त्यौहार में जनता कमाई, पढ़ाई, सिंचाई , महंगाई, दवाई सुनवाई, व कार्यवाही करने वाली सरकार चुने । बिहार, जिसकी पहचान ही‘‘अगड़ा-पिछड़ा‘‘ ‘‘दलित-अति दलित‘‘ ‘‘जातिवाद की राजनीतिक पहचान‘‘ है और लालू यादव तथा राजद की पहचान भी इसी रूप में रही है। बावजूद इसके अभी तक देश में किसी भी प्रदेश में हुए आम चुनावों अथवा लोकसभा के चुनावों में ‘‘गरीबी हटाओ‘‘, ‘‘मंदिर मस्जिद‘‘, ‘‘मंडल कमंडल‘‘, भ्रष्टाचार व अन्यायों मुद्दों के बीच ‘‘रोजगार का मुद्दा‘‘ होते हुए भी यह मुद्दा इन अनेकानेक मुद्दों की भीड़ के बीच जो ढ़क जाता था, को ‘‘मुख्य मुद्दा‘‘ बना कर उस पर समस्त पार्टियों को विचार करने व बोलने के लिए विवश कर दिया। ‘‘चुनावी राजनीति’’ को नई दिशा देने के प्रयास के लिए निश्चित रूप से वे बधाई के पात्र हैं।