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"सुशांत केस’’ ने देश की ‘तंत्र‘ व्यवस्था को ‘‘ए ए ए‘‘ ‘‘श्रेणी’’ में ला दिया है? 
August 28, 2020 • विनोद पान्डेय • विचार-विमर्श

राजीव खंडेलवाल:-



भारत ‘‘अनेकता में एकता‘‘ लिए हुआ देश कहलाता है। ठीक इसी प्रकार भारत विभिन्न ‘‘तंत्र‘‘ लिए हुआ देश भी है। वैसे तो यह विश्व का सबसे बड़ा तांत्रिकों का देश भी है। लेकिन आज मैं इन तांत्रिकों की चर्चा नहीं कर रहा हूँ। ये तांत्रिक स्वंय तो ‘‘समाधि निंद्रा में लीन’’ होते है। जब कि ‘‘राजनैतिक तांत्रिक’’ स्वयं को जाग्रत रखकर जनता को सुनहरे सपनों की दुनिया में नींद में सुलाना ही अपना कर्त्तव्य समझते हैं। इसलिए आज इन ‘तंत्रों’ पर राज करने वाले राजनैतिक तांत्रिकों की चर्चा कर रहा हूँ, जो सामयिकी हैं।
सबसे बड़े तंत्र ‘‘लोक‘‘ ‘‘तंत्र‘‘ के साथ ‘विधायिका’, ‘कार्यपालिका’ व ‘न्यायपालिका’ का ‘मजबूत व आदर्श‘ (?) ‘तंत्र‘ हमारे देश में मौजूद है। इन समस्त तंत्रों के सहयोगी ‘प्रशासन‘, ‘पुलिस‘ और ‘मीडिया‘ तंत्रों के ही ज्यादातर दैनिक जीवन दिनचर्या के कार्यों में आगे रहने से हम सब के सामने इन्हीं तंत्रों के प्रदर्शन ज्यादा होते रहें है। इसीलिए स्वभावतः  प्रमुख रूप से आजकल इन्हीं तंत्रों की चर्चाएं प्रायः ज्यादा होती रहती है। उपरोक्त तंत्रों के उल्लेख करने का आशय मात्र इतना ही है कि, जिस प्रकार डिवेन्चर्स या फिल्मों का मूल्यांकन करते समय इस तरह की श्रेणियां ‘ए‘, ‘एए‘, ‘एएए‘, ‘‘बीबीबी’’, ‘‘सीसी’’,‘डी’ इत्यादि देकर उनका मूल्यांकन किया जाता है। वित्तीय कारोबार में भी क्रेडि़ट रेटिंग एजेंसी (सीआरए) ‘क्रिसिल’, इक्रा’, ‘केयर’, ‘मूडीज’ निमित्त ‘फिच’ इत्यादि रेटिंग देती है। ठीक उसी प्रकार सुशांत केस ने इन समस्त ‘‘तंत्रों’’ को ‘‘मजबूत’’ कर के सबसे सर्वश्रेष्ठ ‘ए ए ए‘ श्रेणी (?) में ला खड़ा किया है, जिसके लिये समस्त ‘‘तंत्रों’’ को बधाई। ‘‘सुशांत‘‘ की तरह लगभग  ‘निष्प्राण‘‘ हो चुके सुशांत प्रकरण में ये समस्त तंत्र एक निमित्त साधन बन गये। कैसे! आइये! आगे देखते है।
सबसे पहले पुलिस तंत्र की चर्चा कर लें। सीबीआई भी आम बोल चाल की भाषा व आम समझ में तो वृहत पुलिस का ही भाग मानी जाती है। सर्वप्रथम पटना पुलिस ने अति सक्रियता दिखा कर मुंबई पुलिस की निष्क्रियता के कारण पुलिस तंत्र पर लगे दाग को धो ड़ाला। लेकिन मुम्बई पुलिस को कटघरे में खड़ा कर दिया। मुख्य रूप से आत्महत्या (अभीतक) की घटित घटना का पटना से कुछ संबंध न होने के बावजूद जिस तेजी से एक लिखित शिकायत पर पटना में प्राथमिकी दर्ज कर ली गई, वह वाकई काबिले तारीफ है। 25 जुलाई को प्राथमिकी दर्ज होने के बाद एसआईटी का गठन फिर शिकायतकर्ता के अनुरोध पर बिहार सरकार द्वारा मामला सीबीआई को सौंपने के लिए सिफारिश करने की तीव्रता दिखाने के साथ केन्द्रीय सरकार द्वारा 48 घंटे में उन्हे स्वीकार कर लेने के लिए भी सारे तंत्र बधाई के पात्र है। जबकि उच्चतम न्यायालय को भी सीबीआई जांच का आदेश देने में एक पखवाड़ा लगा। ‘प्राथमिकी’ दर्ज करने के संबंध में उच्चतम न्यायालय का निर्णय भी अपने पूर्व निर्णयों के विपरीत है। 
सीबीआई, जिसे कभी यही माननीय उच्चतम न्यायालय ने ‘‘तोते का पिंजरा’’ कहा था, की तेजी और सक्रियता, तो देखने लायक होकर लाजवाब है। सीबीआई की इतनी तीव्र सक्रियता, मेहनत  निष्पक्षता व निष्ठा शायद ही कभी हाल के याद आने वाले दिनों में दिखी हो। शायद सीबीआई के लिए सुशांत केस ‘‘वॉटरगेट कांड’’ या ‘‘नानावती हत्याकांड’’ से भी ज्यादा महत्व लिए हो गया है, या उसे ऐसा बनने हेतु बाध्य कर दिया गया है? क्योंकि यह तो देखना ही होगा कि सीबीआई यह सब जो कार्रवाई कर रही है वह पिंजरे में बंद तोते के समान कर रही है या जांच कार्यवाही में सीबीआई का तोता अब पिंजरे से स्वतंत्र हो गया है। अथवा यह ‘‘स्वतंत्रता’’ वैसी ही तो नही है जिसमें  पिंजरे के मालिक  द्वारा तोतेे को स्वतंत्र करने के बावजूद वह उड़ कर वापिस लौट कर पुनः उसी पिंजरे में आ जाता हैं।
‘‘सुशांत’’ का देश के लिए बहुत बड़ा योगदान है? ऐसा लगता है, शायद पंडित दीनदयाल उपाध्याय से भी ज्यादा, जिनकी संदेहास्पद स्थिति में हुई मृत्यु की जांच की क्या स्थिति हुई, सबको विदित है। ‘‘सुशांत‘‘ वर्त्तमान में देश के सबसे बड़े  आइकॉन हो या बना दिये गये है। इसी कारण से सीबीआई ने देश की समस्त जांच एजेंसियों को इस जांच में लगा रखा है। फिर चाहे वह मुंबई पुलिस, बिहार पुलिस, एसटीएफ या नारकोटिक्स जांच एजेंसी (एन.सी.बी) हो, ’’एम्स’’ और इससे भी एक कदम आगे जाकर ‘‘ब्रेन ऑटोप्सी’’ जो अभी तक देश में मात्र तीन बार हुई है। आज तो इस मामले में ‘‘मानवाधिकार आयोग‘‘ भी जुड़ गया है। न्याय का यह मान्य व प्रचलित सिद्धांत है कि भले ही सौ दोषी छूट जाएं, लेकिन एक भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। शायद यही सिद्धांत सीबीआई इस जांच में लगा रहा है कि भले ही सौ पूर्व जांचें असफल हो गई हो, लेकिन इस एक जांच में चाहे गए परिणाम को सामने लाकर सीबीआई अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सकें। इसीलिए इतनी समस्त जांच एजेंसीयों का एक साथ सिर्फ एक मामले में जुड़ना अच्छा लग रहा है न।?
अब बात मीडिया तंत्र की सक्रियता की कर लें। एकाघ मीडिया जैसे ‘एनडीटीवी’ को छोड़ दें तो, लगभग अधिकांश मीडिया ने सुशांत की आत्महत्या होने के दिन से लेकर आज तक अपना कितना समय सुशांत घटना के कवरेज (प्रसार) में लगाया है, इसका आपको अंदाज है? स्वयं को ‘‘सबसे तेज’’ ‘‘सबसे आगे’’ कहने वाले मीडिया को तो अब सबसे ज्यादा समय तक कवरेज करने वाला मीडिया भी कहना चाहिए। अमिताभ बच्चन की एक फिल्म ‘तीन’ संयोग वश जिसे मैंने कल ही देखा है, उसमें उनकी 8 वर्ष की पोती का अपहरण कर लिया जाता है। उसकी जांच पुलिस विभाग के साथ-साथ अभिताभ स्वयं भी करते है और अंजाम तक पहुंच जाते है। शायद इसी फिल्म से प्रेरणा लेकर ही मीडिया भी अलग-अलग अपनी टीमों को भेजकर जांच कर निष्कर्ष निकाल कर कहीं सीबीआई को सहयोग प्रदान तो नहीं कर रही हैं? लेकिन इसी मीडिया ने सुशांत के बाद हुये लगभग डेढ़ महीने बाद एक और कलाकार ‘‘समीर शर्मा’’ की आत्महत्या को ‘‘खबर’’ तक नहीं माना, बेखबर बनी रही । मीडिया की इसी सक्रियता पर उनके ही एक मीडिया साथी अपने एक प्रोग्राम में कह रहे थे, जो खबर नहीं है उसे खबर बनाकर परोसा जा रहा है। मीडिया का एक विकृत चेहरा देखने को मिला है।
मीडिया अपने विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिये खबरों को किस तरह से सिलेक्टिव और चूस (पंसद) करती है, उसकी एक बानगी देखिए! सुशांत व उसके परिवार से संबंधित अक्टूबर-नवंबर 2019 के कुछ वीडियो ’’आज तक’’ ने दर्शकों को दिखाएं और यह कहा की उनके परिवार के बीच तनाव के संबंध नहीं थे, जैसा कि रिया और कुछ अन्य लोग कह रहे हैं। सर्वप्रथम तो सुशांत के उनकी बहन से तनाव के संबंध में कुछ व्हाट्सएप मैसेज भी हैं, जिसे उसी के साथ ‘‘आज तक’’ ने नहीं दिखाया। इसके अतिरिक्त सुशांत व उनके परिवार के बीच कोई दुश्मनी थोड़े ही थी। संबंधों में उतार चढ़ाव रहता था, व कुछ तनाव भी रहता था। इसलिए नवंबर में दिखाएं वीडियो का कतई यह मतलब नहीं है कि उनके परिवार के बीच कभी तनाव रहा ही नहीं। मीडिया का अपने लक्षित (गाइडेड़) उद्देश्य को लेकर खबरों को प्रस्तुत करने का यह एक तरीका मात्र ही हैं।
क्या सीबीआई को मीडिया को भी अपनी एक ‘‘आनुषांगिक शाखा’’ नहीं मान लेनी चाहिए? ताकि उसके कार्यों के वजन का कुछ भार मीडिया वहन कर सकें। वैसे पूर्व में भी हम ‘‘न्यायिक सक्रियता’’ और ‘‘मीडिया की सक्रियता’’ देखते आए है। लेकिन पुलिस तंत्र की सक्रियता की  ऐसी मिशाल शायद ही पहले कभी देखने को मिली होगी। इसीलिए मैंने उपरेाक्त शीर्षक के द्वारा यह जताया है कि सुशांत केस ने समस्त तंत्रों को सक्रिय कर दागों को धोकर जनता की नजर में श्रेणी (अवार्ड) देने की श्रेणी (कैटेगरी) में ला दिया है। जय हो ‘तंत्र’! सुशांत की जय हो! शांत दिखने वाले सुशांत की शांति (जो उस का चरित्र रहा है) ने पूरे देश में अशांति का भूचाल सा ला दिया है और इस धारणा को गलत सिद्ध कर दिया है कि शांति  निस्तब्ध तथा कोला विहीन होती है।  
‘‘आपदा’’ को ‘‘अवसर’’ में बदलने के बोध वाक्य का अनुगमन करने वाले  तथा अन्य राजनैतिकगण, बिहार के होने वाले आगामी आम चुनाव के मद्देनजर हाथ में आये ऐसे अवसर को क्या ऐसे ही चले जाने देगें, छोड़ देगें? शायद नहीं! इसीलिये बिहार का प्रत्येक ‘राजनैतिक वोट’ सुशांत के साथ (शांतिपूर्वक नहीं ?) खड़ा हुआ है।